उच्चतम न्यायालय ने गृहिणियों को ‘राष्ट्र निर्माता’ मानते हुए कहा कि घर और परिवार की देखभाल करने वाली पत्नी की सेवा का मूल्यांकन कम से कम ₹30,000 प्रति माह के आधार पर किया जाना चाहिए। यह आदेश पंजाब में 2001 में हुई सड़क दुर्घटना के मामले में दिया गया, जिसमें पत्नी की मृत्यु हो गई थी। अदालत ने पहले दिए गए मुआवजे में वृद्धि करते हुए ₹8.43 लाख और 7.5% ब्याज देने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू काम भारत की GDP का लगभग 15-17% योगदान देता है, लेकिन इसे औपचारिक मान्यता नहीं मिलती।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी पिता, भले ही बेरोजगार हो, अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण के खर्च के लिए जिम्मेदार है। उदाहरण में, अदालत ने एक पिता को हर महीने ₹3,000 बच्चों के लिए देने का आदेश दिया।



