फॉरेनर्स एक्ट 2025 के बाद बंगाल छोड़ो अभियान तेज, बॉर्डर पर बढ़ी भीड़

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पश्चिम बंगाल में पिछले 1 से 10 साल से अवैध रूप से जमे बांग्लादेशी नागरिकों में नया खौफ देखा जा रहा है, जहां जेल जाने के बजाय ‘होल्डिंग सेंटर्स’ के डर से वे देश छोड़ने को मजबूर हैं।

पश्चिम बंगाल में पिछले 1 से 10 साल से अवैध रूप से जमे बांग्लादेशी नागरिकों में नया खौफ देखा जा रहा है, जहां जेल जाने के बजाय ‘होल्डिंग सेंटर्स’ के डर से वे देश छोड़ने को मजबूर हैं।

पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों से अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों के बड़े पैमाने पर पलायन की बेहद चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। राज्य में पिछले एक साल से लेकर दस साल जैसी लंबी अवधि से अवैध रूप से जमे विदेशी नागरिक अब स्वेच्छा से देश छोड़कर वापस बांग्लादेश भागने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

इस ऐतिहासिक जमीनी बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह पुलिस प्रशासन या सामान्य जेल की कानूनी कार्रवाई नहीं है, बल्कि विभिन्न सीमावर्ती जिलों में तेजी से स्थापित किए जा रहे ‘होल्डिंग सेंटर्स’ का बढ़ता हुआ खौफ है। कानूनी शिकंजा कसने के बाद अब अवैध प्रवासियों को यह साफ समझ आ गया है कि भारत की धरती पर बिना वैध दस्तावेजों के छिपकर रहना अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है।

​जेल की निश्चित मियाद से ज्यादा ‘होल्डिंग सेंटर’ की अनिश्चितता का खौफ
कानूनी विशेषज्ञों और सुरक्षा एजेंसियों के के मुताबिक, पहले के नियमों में जब किसी अवैध नागरिक को विदेशी अधिनियम के तहत पकड़ा जाता था, तो उसे जेल भेज दिया जाता था। जेल में रहने के दौरान उन्हें एक निश्चित कानूनी मियाद और सजा की अवधि का पता होता था, जिसके बाद वे जमानत या रिहाई पाकर दोबारा भारतीय समाज के भीतर छिपने का रास्ता निकाल लेते थे।

हालांकि, नए होल्डिंग सेंटर्स की नियमावली पूरी तरह अलग और बेहद सख्त है। इन सेंटर्स में रखे जाने वाले संदिग्धों की हिरासत की कोई निश्चित समयसीमा नहीं होती है। जब तक बांग्लादेश उनकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करके उन्हें आधिकारिक रूप से वापस लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर लेता, तब तक प्रवासियों को इन्हीं होल्डिंग सेंटर्स में अनिश्चितकाल के लिए कड़े पहरे के बीच रहना पड़ता है।

​नए फॉरेनर्स एक्ट 2025 के कड़े प्रावधान और बायोमेट्रिक सर्विलांस का पहरा
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा लागू की गई ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ नीति को नए ‘इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट, 2025’ से भारी कानूनी मजबूती मिली है। इस नए कानून के तहत सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय पुलिस को यह विशेष अधिकार मिल गया है कि वे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं और सीधे 30 दिनों की शुरुआती प्रशासनिक हिरासत में भेज सकते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और टेक्नोलॉजी-बेस्ड बनाया गया है, जिसके तहत हिरासत में लिए गए हर संदिग्ध व्यक्ति का संपूर्ण बायोमेट्रिक डेटा लेकर उसे केंद्रीय सुरक्षा डेटाबेस से लिंक किया जा रहा है। इस डिजिटल घेराबंदी के कारण अब घुसपैठिए फर्जी आधार कार्ड या राशन कार्ड के भरोसे अपनी पहचान बदलकर दोबारा बंगाल के किसी कोने में छिपने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।

​बॉर्डर चेकपोस्टों पर लगी घर वापसी की होड़ और डैमेज कंट्रोल में जुटा तंत्र
प्रशासनिक और कानूनी चक्रव्यूह के इस कदर मजबूत होने का ही नतीजा है कि उत्तर 24 परगना के पेट्रापोल, हकीमपुर और मालदा के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर चेकपोस्टों पर अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की भारी भीड़ देखी जा रही है। वर्षों से भारत में मजदूरी, खेती या अन्य छोटे-मोटे धंधों में लगे ये लोग अब पकड़े जाने और होल्डिंग सेंटर की चहारदीवारी में कैद होने के डर से खुद ही सीमा सुरक्षा बल के सामने आत्मसमर्पण कर वापस लौटने की गुहार लगा रहे हैं।

सुरक्षा बलों ने भी सीमाई इलाकों में पेट्रोलिंग और खुफिया निगरानी को कई गुना बढ़ा दिया है ताकि डिपोर्टेशन की इस पूरी प्रक्रिया को बिना किसी कानून-व्यवस्था के संकट के बेहद शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया जा सके।

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