देशभर में बढ़ी लैलूंगा के सुगंधित चावल की मांग; बेंगलुरु से कारगिल तक पहुंचा छत्तीसगढ़ का ‘केलो’ जंवाफूल

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Lalunga Kelo Organic Javaphool Rice : छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र में उगाया जाने वाला ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल आज स्थानीय खेती की पहचान बन चुका है. अपनी विशिष्ट सुगंध, अलग स्वाद और उच्च गुणवत्ता के कारण यह चावल अब छत्तीसगढ़ की सीमाओं से बाहर निकलकर देश के कई बड़े बाजारों तक पहुंच गया है. जैविक खेती, बेहतर विपणन और प्रशासनिक सहयोग ने इस पारंपरिक धान की किस्म को किसानों की आय का मजबूत माध्यम बना दिया है. यही वजह है कि किसान अब इस फसल की खेती के रकबे को तेजी से बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

लैलूंगा की पहचान बना ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल

रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल आज अपनी अलग खुशबू और स्वाद के लिए जाना जा रहा है. लंबे समय से पारंपरिक तरीके से उगाई जा रही यह धान की किस्म अब आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ दिला रही है. प्रशासन और कृषि विभाग के सहयोग से इस चावल को ब्रांडिंग और संगठित विपणन का सहारा मिला है, जिससे इसकी पहचान स्थानीय बाजार से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक स्थापित हो रही है.

विशिष्ट जलवायु से मिलता है खास स्वाद और सुगंध

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, जंवाफूल धान की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है, जो लैलूंगा क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु में ही पूरी तरह विकसित हो पाती है. दिन में पर्याप्त गर्मी और रात में हल्की ठंडक इस धान की गुणवत्ता को और बेहतर बनाती है. यही भौगोलिक परिस्थितियां लैलूंगा में उत्पादित चावल को दूसरे इलाकों के चावल से अलग बनाती हैं, जिससे उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.

छत्तीसगढ़ से बाहर भी बन रही बाजार में जगह

‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल की लोकप्रियता अब राज्य की सीमाओं को पार कर चुकी है. बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी इस चावल की मांग बढ़ी है. वर्तमान में इसका बाजार मूल्य करीब 150 रुपये प्रति किलो है, जो किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने में मदद कर रहा है. वहीं इसके बीज किसानों को लगभग 70 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जिससे अधिक किसान इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं.

किसानों के लिए मुनाफे का सौदा बनी फसल

लैलूंगा के किसान चंद्रशेखर पटेल बताते हैं कि उनके परिवार में कई वर्षों से जंवाफूल चावल की खेती की जा रही है, लेकिन अब इसकी मांग और पहचान में जबरदस्त वृद्धि हुई है. इस वर्ष उन्होंने चार एकड़ में जंवाफूल की खेती की, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 30 हजार रुपये की लागत आई. पटेल के अनुसार, उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये से अधिक की आय प्राप्त हो रही है, जो पारंपरिक धान की तुलना में कहीं अधिक है. उनका कहना है कि इस फसल ने उन्हें स्थिर और संतोषजनक आय का भरोसा दिया है.

जैविक खेती से बढ़ रही गुणवत्ता और भरोसा

ग्राम खैरबहार के किसान भवानी पंडा ने बताया कि वे वर्ष 2015 से खेती कर रहे हैं और धीरे‑धीरे जंवाफूल चावल की खेती की ओर बढ़े. वे पूरी तरह जैविक पद्धति अपनाते हैं, जिसमें किसी भी तरह के रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता. हरी खाद के प्रयोग से वे खेत की उर्वरता बनाए रखते हैं. उनके अनुसार, जंवाफूल चावल से उन्हें पारंपरिक धान की तुलना में अधिक लाभ मिल रहा है.

खेती का रकबा बढ़ाने की तैयारी

भवानी पंडा वर्तमान में दो एकड़ में जंवाफूल की खेती कर रहे हैं और आने वाले समय में इसे 20 एकड़ तक बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं. उनका कहना है कि जैविक तरीके से की जा रही खेती के कारण चावल की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनी रहती है. रासायनिक मुक्त उत्पादन होने से इसे स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर माना जाता है, जिससे उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं.

पिछले वर्ष लैलूंगा क्षेत्र में लगभग 700 एकड़ में जंवाफूल चावल की खेती की गई थी. इस वर्ष इसे बढ़ाकर 2000 एकड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. प्रशासन का मानना है कि इससे अधिक से अधिक किसान इस लाभकारी जैविक फसल से जुड़ सकेंगे और उनकी आय में स्थायी वृद्धि होगी. साथ ही क्षेत्र की पहचान एक विशिष्ट जैविक उत्पादक क्षेत्र के रूप में और मजबूत होगी.

कृषि विभाग द्वारा जंवाफूल चावल की खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं. इसके साथ‑साथ किसान समूहों और एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) के माध्यम से उत्पादन और विपणन को संगठित किया जा रहा है, ताकि किसानों को बाजार तक सीधी पहुंच मिल सके.

कृषि और बाजार का मजबूत उदाहरण

लैलूंगा का ‘केलो’ जैविक जंवाफूल चावल यह साबित कर रहा है कि अगर पारंपरिक खेती को आधुनिक विपणन, जैविक पद्धति और सरकारी सहयोग मिले, तो किसान न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि अपने उत्पाद को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिला सकते हैं. यह फसल आने वाले समय में छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए आर्थिक सशक्तीकरण की एक मजबूत मिसाल बन सकती है.

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