छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, केवल मारपीट के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का दोष साबित नहीं होता

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बिलासपुर 
 छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2009 के एक आत्महत्या उकसाने के मामले में तीन जीवित अपीलकर्ताओं की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया है. अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अभियुक्तों की मंशा मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाने की थी। 

न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने निचली अदालत के अप्रैल 2013 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार किया, जिसमें अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और धारा 34 के तहत 10 साल के कठोर कारावास और ₹500 के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। 

यह मामला अंबिकापुर का है, जहाँ 18 अप्रैल 2009 को एक महिला ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी. अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना से ठीक पांच दिन पहले (13 अप्रैल 2009 को) महिला और उसके होने वाले पति के साथ अभियुक्तों (जो महिला के दूर के रिश्तेदार थे) ने मारपीट की थी, क्योंकि उन्हें दोनों के एक साथ होने पर आपत्ति थी। 

अपीलकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में तर्क दिया कि केवल मारपीट की घटना से उकसावे का अपराध सिद्ध नहीं होता और कथित सुसाइड नोट से जुड़ी हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट को भी अदालत में कानूनी रूप से साबित नहीं किया गया था। 

मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि साक्ष्यों से मारपीट की घटना तो साबित होती है, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक आपराधिक मंशा (इरादा) साबित नहीं हुई। 

अदालत ने टिप्पणी की कि घटना आत्महत्या से लगभग पांच दिन पहले हुई थी और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं लाया गया है जिससे यह पता चले कि अभियुक्तों ने महिला को खुदकुशी के लिए उकसाने के मकसद से मारपीट की थी। 

सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने निचली अदालत के 2013 के सजा के आदेश को निरस्त कर दिया और अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया. साथ ही, अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 481 के प्रावधानों के तहत उनके जमानत मुकले (बेल बॉन्ड) को छह महीने की अवधि के लिए प्रभावी रखने का निर्देश दिया है। 

 

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